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druids

 

The Secret of the Druids is an exceptional novel with well researched story. It is like a big magical cauldron, mixing a perfect cocktail of mythology, history and legends.

This third installment of the Mahabharata Series will take you on a journey of Julius Caeser and beyond, into the mystical times of Druids and ancient India. How roots of ancient Indian civilization spanned across the planet creating Gods and Goddesses. How Immortal glory of our ancient past lived among the legends and stories of the lands across the sea.

Doyle’s scientifically detailed and almost accurate explanation of the secret will dwell in your mind, making sure that you conduct your own research on it. Trust me when I say, you will be enthralled with the revelations of the secret. He has left plenty of dots scattered all along for us to connect.

Vijay and team played the cat and mouse game with the mysterious and mighty ‘The Order’ against time, which I think made some part of the book predictable. Yet, there was a clear effort to bring new adventure by introducing new characters on both the side.

The only part I disliked was the injustice done with some of the key characters of the book. Characters like Radha, Kurt Wallace, Dee deserved more story space and background. Fate of some of them are even left to a cliffhanger without any hint of closure.

All in all, The Secret Of The Druids is a must read for people who love legends, mythologies and mysteries.

tulasi

 

बड़े ज़माने बाद मौका मिला फिर से नानी के घर जाने का,
यादें हुई ताज़ा फिर बचपन की और वो सफर जवानी का…

हर्ष उल्लास से भरा मन और दिल में फिर से जाएगा वो आवारापन…

जब हम पहुंचे वहाँ तो मंजर ही अलग था,
दरवाज़े टूटे हुए और पूरा घर खंडहर था…

आशाएं सब चूर हुई, पर तभी अचानक दिखा कुछ चमकता सुनहरा,
आँगन में आज भी खड़ा था वही पुराना तुलसी का चौरा…

नानी कहा करती थी, बेटा ये बुजुर्ग है हमारी,
इन्ही से रहती है घर में खुशियां सारी…

हमने सोचा इसी सहारे याद कुछ तो कर लेते है,
ज़िन्दगी के भूले लम्हों को चलो फिर से जी लेते है…

खेला करते थे हम क्रिकेट, बना इसी तुलसी के चौरे को विकेट…
माँ डंडा लिए हमें दौड़ाया करती थी, वो भगवान का है स्वरुप ये समझाया करती थी…

कार्तिक में नानी रोज़ तुलसी को दिया दिखाया करती थी,
और एकादशी में धूम धाम से शादी करवाया करती थी…

मगन हो हम पूरा दिन तुलसी का चौरा सजाया करते थे,
और शाम को शालिग्राम की बारात लाया करते थे…

माँ जिस तुलसी के चौरे पर जल रोज़ चढ़ाया करती थी,
वही तुलसी सूख आज सूरज से आग जलाया करती है…

खुद समय बन इतिहास बताता नानी वाला तुलसी का चौरा,
टूट फुट जर्जर हो चूका फिर भी बचपन दिखलाता नानी वाला तुलसी का चौरा…

इस नए दौर के चकाचौंध में सब भूल गए बीते कल को,
बाहर किया छोटे घर और उससे भी छोटे दिल से तुलसी के चौरे को…

इस आस का प्रयास है ये, रखे हम दिल में उस तुलसी की याद,
और सुनाये कहानी नयी पीड़ी को उनके आने के बाद.

dwand

लो फिर आ गया में कुरुक्षेत्र के मैदान में…
अपने कृष्ण के मोह में,
अपने कृष्ण के सम्मान में…

चारो और हाहाकार था मचा,
और में समय में पीछे हो चला…

था मैं शयनकक्ष के द्धार पर खड़ा,
दुर्योधन सिरहाने और अर्जुन पाँव था पड़ा…

आँखे खुली भगवान की जब,
देखा अर्जुन को पहले खड़ा तब…

भोले बनकर इच्छा पूछी,
जानते थे सब किसकी क्या है रूचि…

बातें निकली और तब आगे,
सुनता रहा मैं सब जागे-जागे…

धधक उठा मन, साँसे हुई अधूरी,
जब सुना की जायेंगे खुद पांडवो के साथ और दे दी दुर्योधन को सेना पूरी…

कही धमाका हुआ बड़ा,
मैं फिर से रण में हुआ खड़ा…

लाशें गिर रही चारो और हर क्षण,
युद्ध शुरू हुआ जो भीषण…

लिए तलवार शत्रु का सर काटने लगा,
न जाने कितने थे अपने और कौन कौन था सगा…

कभी लाशो पर चला, कभी खून सनी मिटटी पर गिरा,
पर अपने कर्म पर था मै अडिग खड़ा…

सामने दिखा तभी अर्जुन का रथ,
दिखा रहे जिसे मेरे कृष्ण पथ…

दिल और दिमाग का फिर द्वन्द – प्रतिद्वंद हुआ,
ऊठाऊँ उसपर शस्त्र मैं कैसे जिसको मेरे हरी ने छुआ…

घुटनो पर बैठ सर मैंने दिया झुका,
अब होगा बस वो जो मेरे भगवान ने कहा…

न जाने कितने बाण लगे, न जाने कितने भाले चुभे…
मैं गिरा हथियार अपने डाल,
वो अंतरद्वन्द था मेरा जिसने था किया मुझे निढाल…

बस मन में जागा एक ही सवाल,
क्यों ? आखिर क्यों कृष्ण तुमने हमारा किया ये हाल…

थे हम तो तुम्हे सबसे प्यारे,
फिर क्यों तोड़ दिए तुमने बंधन सारे…

है नहीं मुझको दुःख की मैं इस तरह मरूंगा,
बस तड़प रहा हूँ की मैं अनंतकाल इस अंतर्द्वंद में जलूँगा…

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Plot: 4/5

Characters: 3/5

Writing Style: 4/5

Climax: 3/5

Entertainment Meter: 4/5

Unique in its own way, Svaha is a blend of rich Indian mythology and a super hero’s saga. After reading about Thor of Norse mythology and Zeus of Greek mythology finally we have a superhero from our own Indian mythology. It is a fictional story woven around the folk tales and Indian myths of our childhood.

Slash, young reckless naive girl found herself in middle of the grand plan of humanity’s destruction. However, she has a guardian angel on her shoulder, indestructible Soldier X. Flying man in a leather jacket who is cool in his own way.
There is no particular villain, but yes several very important characters. Some of turn try to open the portal between the two worlds to unleash one of the most feared villain of Indian mythology.

There are several sub-plots in midst of the story which creates a larger picture on the whole. Major Khanna from FORCE ONE, Paramacharya of the Trimbak math, The Council and The Deus Corp all trying to exploit the opportunity and achieve their own agenda. The key piece to save the world is ‘The Chosen One’ with Angel on her shoulder.

Can Slash save the world from destruction? Who exactly is Soldier X? Why is He helping Slash?
Pratik did a wonderful job, narrating the whole story in a short and crisp chapters. He avoided the details, which I personally don’t like but way he carried away the whole story with so many sub-plots is admirable. Backdrop of the protagonists and the antagonists are beautifully explained. He built the sense of excitement and suspense which is flawless.

Book ends on a cliffhanger with some loose ends clearly indicating the forthcoming sequels.

With ‘Svaha’, Pratik started an altogether new genre of Indian superhero writing which was long-awaited.

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