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tulasi

 

बड़े ज़माने बाद मौका मिला फिर से नानी के घर जाने का,
यादें हुई ताज़ा फिर बचपन की और वो सफर जवानी का…

हर्ष उल्लास से भरा मन और दिल में फिर से जाएगा वो आवारापन…

जब हम पहुंचे वहाँ तो मंजर ही अलग था,
दरवाज़े टूटे हुए और पूरा घर खंडहर था…

आशाएं सब चूर हुई, पर तभी अचानक दिखा कुछ चमकता सुनहरा,
आँगन में आज भी खड़ा था वही पुराना तुलसी का चौरा…

नानी कहा करती थी, बेटा ये बुजुर्ग है हमारी,
इन्ही से रहती है घर में खुशियां सारी…

हमने सोचा इसी सहारे याद कुछ तो कर लेते है,
ज़िन्दगी के भूले लम्हों को चलो फिर से जी लेते है…

खेला करते थे हम क्रिकेट, बना इसी तुलसी के चौरे को विकेट…
माँ डंडा लिए हमें दौड़ाया करती थी, वो भगवान का है स्वरुप ये समझाया करती थी…

कार्तिक में नानी रोज़ तुलसी को दिया दिखाया करती थी,
और एकादशी में धूम धाम से शादी करवाया करती थी…

मगन हो हम पूरा दिन तुलसी का चौरा सजाया करते थे,
और शाम को शालिग्राम की बारात लाया करते थे…

माँ जिस तुलसी के चौरे पर जल रोज़ चढ़ाया करती थी,
वही तुलसी सूख आज सूरज से आग जलाया करती है…

खुद समय बन इतिहास बताता नानी वाला तुलसी का चौरा,
टूट फुट जर्जर हो चूका फिर भी बचपन दिखलाता नानी वाला तुलसी का चौरा…

इस नए दौर के चकाचौंध में सब भूल गए बीते कल को,
बाहर किया छोटे घर और उससे भी छोटे दिल से तुलसी के चौरे को…

इस आस का प्रयास है ये, रखे हम दिल में उस तुलसी की याद,
और सुनाये कहानी नयी पीड़ी को उनके आने के बाद.

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सांस लेते हुए भी अब घबराते है हम,
ना जाने कौन सी हवा तुम्हारी खुशबु ले आये…

सुनते थे बेसुध होकर जो तराने, अब सुनते हुए डरते है हम,
ना जाने कौन सी धुन तुम्हारे पायलों की छनक ले आये…

जिन किताबो को गले से लगाये रखते थे कभी, उन्हें छुपा दिया है कहीं,
ना जाने कौन सा पन्ना तुम्हारी कहानी ले आये…

लिखा करते थे बेपरवाह हो कर जिन डायरियों में ज़िन्दगी का हिसाब,
कलम लगा कर अलमारी में दबा दिया है कहीं,
ना जाने कौन सी तारीख पर तुम्हारा दिया हुआ सुखा फूल मिल जाए…

रातों को छत पर जाकर आसमान देखते डरते है हम,
ना जाने किस तारे में तुम्हारे आँखों की चमक दिख जाये…

सब कर के देख लिया, हर मुमकिन कोशिश कर ली,
पर जब भी आँखे बंद करते है हम,
ना जाने कैसे तुम्हारी यादों का पिटारा खुल जाता है…

और फिर बस यही लगता है की कभी ना खुले ये आँखे,
हम जीते रहे यूँ ही तुम्हारी यादों के साथ…

जीने मरने का फर्क अब समझ नहीं आता,
आँखे खोल दिन भर मरते है हम,
और रात भर उन्हें बंद कर ज़िन्दगी जीते है हम…

फिर भी यही सोच कर साँसे रोक नहीं पाते,
ना जाने कौन सा लम्हा तुम्हे वापस मेरे आगोश में ले आये.

blogadda

pyaar ka matlab

वो पूछते रहे रात भर प्यार का मतलब हमसे,
करते रहे पढ़ने की कोशिश अनपढ़ी किताब…

हम भी रात भर घोंटते रहे गला अपने चीखते हुए दिल का,
डरते रहे निकल न जाये कही वो बात अनकही…

प्यार और दिल का न जाने ये कैसा अजीब रिश्ता है,
कभी कोई शैतान तो कोई फरिश्ता है…

ज़िन्दगी में फैसले बड़े कठिन लगे हमें,
कभी आग में जले तो कभी अँधेरे में थमे…

फिर न जाने ये ज़िन्दगी कैसे मोड़ पर ले आई,
हमारे अंदर कश्मकश ने कैसी आंधी सी मचाई…

तबाह हुए ऐसे की फिर संभल न सके,
अपने प्यार का मतलब दिल के तूफानों से बचा न सके…

मन की संवेदना सब शून्य हो चुकी है,
लफ्ज़, अल्फाज़ो की बस राख सी बची है…

तुम्हे क्या समझाते की जो खुद समझ ना सके हम,
बस कहते रहे की अब हमारे प्यार का मतलब हो बस तुम…

तुम जिसे हमने प्यार का मतलब बनाया,
और अपने प्यार का मतलब भी बस तुम्ही से पाया.

 

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हम रोज़ तलाश करते है,
वो हंसी मज़ाक में लिपटी रातें…
वो खिलखिलाहटों की लड़ी,
वो ख़ुशी से निकलता प्यार…
जब हँसते हुए आँखे नम थी पड़ी हमारी,
जब ख़ुशी से साँसे फूली हुई थी तुम्हारी…
वो नुक्कड़ के पत्थर पर देर रात तक गप्पे मारना,
वो दुसरो की नक़ल उतारना वो फालतू की बातें बनाना…आज भी जब उस नुक्कड़ से निकलते है,
वो पत्थर तुम्हे आवाज़ लगाते है…वो रातें उदास सी आज भी तुम्हारी राह तकती है…वो छूटे हुए मोड़ आज भी तुम्हारी हंसी को तरसते है…हम ढूंढ़ते है आज भी ज़िन्दगी के लम्हों में उस सुकून की गूंज…

हम तलाशते है आज भी तेरी आँखों की चमक,
हर रात आसमानो में