सिगरेट

यूँ बैठे है शाम से न जाने किस दुनिया में खोये…
ढूंढ रहे है मतलब आती जाती साँसों का

सिगरेट की राख से हवाओ ने तुम्हारा नाम सा लिख दिया है…
शायद याद दिलाने को जो कभी कहा था तुमने

की दिल की आग नहीं बुझेगी इस तरह सुलगने से…
और प्यास नहीं बुझेगी यूँ दिन रात धुंआ पीने से

हम समझाते रहे अपने आप को की ये सब है बस फालतू की बातें…
और आजकल बिता देते है खुली आँखों से सारी रातें

लफ्ज़ नहीं मिलते आज भी, की तुम्हे बता सके…
अलफ़ाज़ ही नहीं आते ज़बान पर की तुम्हे समझा सके

यूं सुलगती हुई सिगरेट से निकलता हुआ धुंआ…
असल में मेरे दिल का अक्स है

और जो राख से लिखा हुआ है नाम तुम्हारा…
वह असल में राख हुआ दिल है हमारा

ये सोच कर होठों से लगाये रखता हूँ इन्हे…
शायद तुम्हे कभी पता चले…
की मेरी आग मुझमे मरी नहीं

बस तरीके बदल गए है तुम्हे प्यार जताने के

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