ना जाने

Posted: September 3, 2014 in Hindi poems
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man_sitting_alone_facing_the_world

सांस लेते हुए भी अब घबराते है हम,
ना जाने कौन सी हवा तुम्हारी खुशबु ले आये…

सुनते थे बेसुध होकर जो तराने, अब सुनते हुए डरते है हम,
ना जाने कौन सी धुन तुम्हारे पायलों की छनक ले आये…

जिन किताबो को गले से लगाये रखते थे कभी, उन्हें छुपा दिया है कहीं,
ना जाने कौन सा पन्ना तुम्हारी कहानी ले आये…

लिखा करते थे बेपरवाह हो कर जिन डायरियों में ज़िन्दगी का हिसाब,
कलम लगा कर अलमारी में दबा दिया है कहीं,
ना जाने कौन सी तारीख पर तुम्हारा दिया हुआ सुखा फूल मिल जाए…

रातों को छत पर जाकर आसमान देखते डरते है हम,
ना जाने किस तारे में तुम्हारे आँखों की चमक दिख जाये…

सब कर के देख लिया, हर मुमकिन कोशिश कर ली,
पर जब भी आँखे बंद करते है हम,
ना जाने कैसे तुम्हारी यादों का पिटारा खुल जाता है…

और फिर बस यही लगता है की कभी ना खुले ये आँखे,
हम जीते रहे यूँ ही तुम्हारी यादों के साथ…

जीने मरने का फर्क अब समझ नहीं आता,
आँखे खोल दिन भर मरते है हम,
और रात भर उन्हें बंद कर ज़िन्दगी जीते है हम…

फिर भी यही सोच कर साँसे रोक नहीं पाते,
ना जाने कौन सा लम्हा तुम्हे वापस मेरे आगोश में ले आये.

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Comments
  1. DilSe says:

    बहुत अच्छी लिखी है!

  2. Pankaj says:

    Aapke aaj tak ki kavitao ka ye uchhtam shikar hai…! Jisme, shabda, bhav aur lay ka bahut hi bakhubi istemal kiya gaya hai..! Bahut achhi lagi aapki ye kavita…! Sabse achhi panktiya ye lagi hume…लिखा करते थे बेपरवाह हो कर जिन डायरियों में ज़िन्दगी का हिसाब,
    कलम लगा कर अलमारी में दबा दिया है कहीं,
    ना जाने कौन सी तारीख पर तुम्हारा दिया हुआ सुखा फूल मिल जाए…

    kya baat hai…!

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